
लंदन
कृधांश की नज़रें आरुष के हाथ पर टिकी हुई थीं, जो कि एग्जैक्टली वृद्धि के कंधे पर रखा था और उसने खुद से रखा भी नहीं था; वृद्धि ने उसका हाथ पकड़ा हुआ था। आरुष कभी कृधांश को देखता तो कभी वृद्धि को, उसे खुद समझ में नहीं आ रहा था कि वो क्या करे। इस सिचुएशन में उसे वहां पर एक अजीब सी टेंशन फील हो रही थी, जो अच्छी तो कहीं से भी नहीं थी।















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